Tuesday, October 19, 2021
Home जीवन की राह हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम

हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम

साभार : योगाग्नि

आजकल समाज में अष्ट-मैथुनों के अलावा और भी मैथुन नवयुवकों में बड़े भीषण रूप से फैल गया है। इस मैथुन से तो बालकों का बड़ा भारी संहार हो रहा है। प्लेग और इन्फ्लुएञ्जा से कहीं बढ़कर यह नया रोग नवयुवकों को जान से मार रहा है। यही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे हुए लोग भी इस काल के कराल पंजे में ‘मोहवश’ जा रहे हैं। हा! वह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है।

इस महारोग से पिंड छुड़ाना प्लेग इन्फ्लुएञ्जा से भी महा कठिन हो गया है। इस महारोग को हस्तमैथुन का रोग कहते हैं। यह रोग बड़ा भयानक है। यह राक्षस मनुष्य को बड़ी क्रूरता से बिल्कुल निचोड़ डालता है। यह भी एक प्रकार की स्त्री की नवविधा भक्ति ही है। फर्क इतना ही है कि परमात्मा की नवविधा भक्ति से मनुष्य की मुक्ति होती है और स्त्री की किंवा विषय की इस नवविधा भक्ति से मनुष्य को नरक की प्राप्ति होती है।

हस्तमैथुन के कारण जितनी हानियाँ उठानी पड़ती हैं यदि केवल उनके नाम ही लिखे जायँ तो एक छोटी-सी पुस्तिका तैयार हो सकती है। हम यहाँ पर इन अनिष्टकारी कुटेवों का संक्षेप में वर्णन करते हैं। किसी लकड़ी को घुन लगने से जैसे वह बिल्कुल खोखली पड़ जाती है, वैसे ही इस अधम कुटेव से मनुष्य की अवस्था जर्जरीभूत हो जाती है।

हस्तमैथुन को अंग्रेजी में मास्टरबेशन (Masturbation) कहते हैं। कोई मुष्टमैथुन, हस्तक्रिया अथवा आत्म-मैथुन भी कहते हैं। हस्तमैथुन से इन्द्री की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं। फल यह होता है कि स्नायुओं के दुर्बल होने से जननेन्द्रिय टेढ़ा, लघु, पीला पड़ जाता है। मुख की ओर मोटा और जड़ की ओर पतला पड़ जाता है। यहीं पर एक नस होती है। वह उभर आती है और मुँह के पास बाई ओर कँटिया की तरह टेढ़ी बन जाती है। यह नितांत नपुंसकता का चिह है। ऐसे एक बालक को मैंने स्वयं देखा है। नस-दौर्बल्य से बारबार स्वप्न दोष होने लगता है। सामान्य काम-संकल्प से अथवा श्रृङ्गारिक वर्णन, गायन के दृश्यमात्र से ही ऐसे पतित पुरुष का वीर्य नष्ट होने लगता है। उसका वीर्य पानी की तरह इतना पतला पड़ जाता है कि स्वप्नदोष के बाद वस्त्र पर उसका चिह्न तक नहीं दिखाई देता। इन्द्री में वीर्य धारण करने की शक्ति नहीं रह जाती है। ऐसा पुरुष स्त्री-समागम के सर्वथा अयोग्य बन जाता है।

शरीर के भीतर ‘मनोवहा’ नामक एक नाड़ी है। इस नाड़ी के साथ शरीर की सम्पूर्ण नाड़ियों का सम्बन्ध है। काम-भाव जागृत होते ही ये सब नाड़ियाँ काँप उठती हैं और शरीर के पैर से सिर तक के सब यन्त्र हिल जाते हैं, फिर रक्त का तथा सम्पूर्ण शरीर का मथन होकर वीर्य उनसे भिन्न होकर नष्ट होने लगता है जिससे धातु-दौर्बल्य, प्रमेह, स्वा-मेह, मधुमेहादि कठिन रोग शरीर में घर कर लेते हैं।

शरीर के खून में एक सफेद (White corpuscles) और दूसरे लाल (Red corpuscles) कीट होते हैं। सफेद कीटों में रोगों के कीटों से लड़ने की शक्ति होती है। वीर्य जितना ही पुष्ट व अधिक होता है उतने ही ये शुभ्र कीट बलवान होते हैं और विष को पचा डालने की शक्ति रखते हैं। परन्तु ज्यों ही वीर्य क्षीण होता है, त्योंही ये कीट भी दुर्बल बनकर हैजा, प्लेग, मलेरिया के कीटाणुओं से दब जाते हैं, और फिर मनुष्य भी काल के गाल में चले जाते हैं। ये वीर्यनाश के ही दारुण फल हैं। हस्तमैथुन से जो वीर्यनाश किया जाता है उससे शरीर और दिमाग के समस्त स्नायुओं पर भारी धक्का पहुँचता है। जिससे पक्षाघात, ग्रन्थिवात, सन्धिवात, अपस्मार-मृगी और पागलपन आदि भीषण रोगों की उत्पत्ति होती है। व्यभिचार तो सर्वथा निंद्य है ही, परन्तु उससे भी महातिनिंद्य यह हस्तमैथुन का कार्य है। हस्तमैथुन द्वारा वीर्य से निकलने से कलेजे पर विशेष धक्का लगता है, जिससे क्षय, खाँसी, श्वास, यक्ष्मा और “हार्ट डिसीज़” नामक महा भयानक हृदय रोग हो जाते हैं। हृदय रोग से ऐसे अभागे मनुष्य की कौन से समय में मृत्यु होगी इसका कुछ भी निश्चय नहीं होता। अकाल ही में वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मस्तिष्क पर तो बिजली का धक्का लगता है। हस्तमैथुन से सिर फौरन हलका और खाली पड़ जाता है। स्मृति (याददाश्त), सुबुद्ध, प्रतिभा सभी चौपट हो जाते हैं, और अन्त में ऐसा नष्ट-वीर्य पुरुष पागल सा बन जाता है। पागलखानों में 100 में 95 आदमी व्यभिचारी और हस्तमैथुन के “ही कारण पागल बने होते हैं। यही हालत अपनी स्त्री से अति रति करने वालों की भी हुआ करती है।

टारेंटो के डाक्टर वर्कमान कहते हैं – “सैकड़ों पागलखानों की जाँच करने पर हमें यही ज्ञात हुआ कि जिनको हम आप नीतिभ्रष्ट, अशिक्षित व मूर्ख समझते हैं उनमें नहीं किन्तु धर्म से, स्वच्छता से रहने वाले शिक्षित लोगों में ही यह हस्तमैथुन का रोग विशेष रूप से फैला हुआ है।” खेतों में शारीरिक परिश्रम करने वाले मूर्खों में नहीं, किन्तु शहरों के पुस्तक-कीट बने हुए नवयुवकों और आदमियों में ही यह घृणित रोग विशेष फैला हुआ है। माता-पिता इस भीतरी कारण को नहीं जानते। वे समझते हैं कि परिश्रम की अधिकता से ही बालकों की ऐसी दुर्दशा हुई है। मस्तिष्क कमजोर हो जाती है। बाल झड़ने व पकने लगते हैं। राजा के घायल होते ही जैसे सम्पूर्ण सेना एक बारगी घबड़ा जाती है, उसी प्रकार वीर्य-रूपी राजा को आघात पहुँचते ही शरीर की इन्द्रिय रूपी सेना एक बारगी अस्वस्थ व कमजोर हो जाती है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, वाणी, पैर, त्वचा, आँतें और मलमूत्रंद्रिय अपना काम करने में असमर्थ हो जाती हैं, फिर तो ऐसे पुरुष का बहुत जल्द नाश होता ही है।

हस्तमैथुन से सम्पूर्ण शरीर पीला, ढीला, फीका, दुर्बल व रोगी बन जाता है। मुख कांतिहीन व पीला पड़ जाता है। ऐसा पुरुष जीवन रहते हुए भी मुर्दा होता है। हाय! जिस विषयानन्द को कामी लोग ब्रह्मानन्द से बढ़कर समझते हैं वह विषयानन्द भी ऐसे पतित पुरुष ज्यादा दिन तक नहीं भोग सकते। इन्द्रिय दुर्बलता के और अन्यान्य रोगों के कारण वे ग्राहस्थ्य-सुख भी नहीं भोग सकते। उनकी सन्तानोत्पादन-शक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे उनकी स्त्रियाँ वन्ध्या बनी रहती हैं। अथवा सन्तान हुयी तो कन्या ही कन्या होती हैं। ऐसे लोग काम के मारे बेकाम बन जाते हैं। सन्तति-सुख से वे हाथ धो बैठते हैं। उनकी स्त्रियों को भी सन्तोष नहीं होता है। फिर वे व्यभिचार करने लगती हैं। स्त्रियों के बिगड़ने से सन्तान भी दुःसाध्य होती है व अधर्म की वृद्धि होती है अधर्म के फैलते ही घर व देश में दारिद्र्य, अकाल व अशान्ति आदि फैलते हैं। फिर सुख की आशा कहाँ? अन्त में सब कुल नरकगामी होता है। (गीता अ0 1 ला, श्लोक 41 से 44 देखो) इस महापाप के मूल कारण व भागी दुराचारी पुरुष ही होते हैं।

हाय! यह बड़ा ही अधर्म और दुष्ट कर्म है। जिस अभागे को इसके करने का एक बार भी दुर्भाग्य प्राप्त हुआ है तो धीरे-धीरे यह ‘शैतान’ हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाता है, यहाँ तक कि प्राण बचाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे पुरुष इस महानिंद्य कुटेव के पूर्ण गुलाम बन जाते हैं। दुर्बल चित्त के कारण इच्छा करने पर भी वे संयम नहीं कर सकते। हजारों प्रतिज्ञायें करने पर भी एक ही प्रतिज्ञा पूरी नहीं होने पाती। विषयों के सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं। इस प्रकार वीर्य को नष्ट करने में मनुष्य का मनुष्यत्व लोप हो जाता है और उसका जीवन उसी को भार स्वरूप मालूम होने लगता है। आबोहवा का परिवर्तन थोड़ा भी सहन नहीं होता। हर समय सर्दी-गर्मी मालूम होने लगती है। जुकाम, सिरदर्द और छाती में पीड़ा होने लगती है। ऋतुओं के बदलते ही उसके स्वास्थ्य में भी फरक होता है और अन्यान्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश में जब कभी कोई बीमारी फैलती है तो सबसे पहिले ऐसा ही पुरुष बीमार पड़ता है और अक्सर वही काल का शिकार बनता है।

हाय! ऋषि-सन्तानों के दिव्य नेत्र व ज्ञाननेत्र सब नष्ट हो गये हैं और उनको अब उपनेत्र के बिना देखना भी मुश्किल हो गया है। अज्ञान की घनघोर घटा भारत-आकाश को चारों ओर से आच्छन्न कर रही है। आर्य सन्तान आज पूर्णतया तेजहीन व गुलाम बनकर भारत माता का मुख कलङ्कित कर रही है। हा! शोक! शोक!! शोक!!! बस अब हम इससे अधिक वर्णन करना नहीं चाहते। केवल वीर्य भ्रष्टता के प्रमुख चिह्न ही कह कर इस विषय को समाप्त करते हैं जिससे कि लोग पतित बालक, बालिका, व स्त्री-पुरुष को फौरन पहिचान सकें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

बिहार में पंचायत चुनाव की बजी बिगुल, 10 चरण में चुनाव

निर्वाचन आयोग की घोषणा के साथ राज्य में पंचायत चुनाव 2021 की अधिसूचना लागू हो गयी है। 10 चरणों में पंचायत चुनाव...

मुलेठी / यष्टीमधु अनेक रोगों की श्रेष्ठ औषधि

दौरे पड़ना (फिट आना)- सवेरे एवं सायंकाल 1 छोटी  चम्मच मुलेठी चूर्ण आधा गिलास कुम्हडे के रस के साथ...

Recent Comments