Tuesday, October 19, 2021
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बिहार चुनाव 2020 : महागठबंधन की जीत और NDA की हार के मूल कारण

बिहार चुनाव 2020 अपने अंतिम चरण की ओर है. एग्जिट पोल्स के रुझानों ने उन सभी विश्लेषकों, चुनावी राजनिति के रणनीतिकारों, गठबंधन की राजनिति को जीत और हार का आधार मानाने वालो, जाति और धर्म के आधार पर चुनावों का पूर्वानुमान बताने वाले राजनितिक भविष्यवक्ताओं और चुनावी मौसम वैज्ञानिकों तथा टीवी चैनलों पर दिन रात बहस करने वाले प्रवक्ताओं के साथ फार्मूले की राजनीती करने वालों को पुनर्विचार पर मजबूर कर दिया है.

देखना मजेदार होगा – क्या हैं मूल कारण इस हार और जीत के ?

चुनाव के शुरूआती दिनों में मुख्य रूप से सभी का यही मानना था कि केन्द्रीय सत्ता और राज्य सत्ताधारी का गठबंधन ही, भविष्य का सताधिकारी होगा. नितीश कुमार का विकास, मोदी जी का करिश्माई वैक्तित्व अपना जलवा दिखायेगा और NDA गठबंधन चुनाव जीत जायेगा. पर सबकुछ होते हुए भी हुआ इसके विपरीत.

मौजूदा सत्ता की आम जनता से दूरी –

पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री नितीश कुमार की लोकप्रियता धीरे धीरे कम हुई है तो इसके कई कारण हैं. सबसे बड़ी वजह आम जनता से बढती गई दूरी. याद करें कि शुरुआत के दो कार्यकालों में नितीश, “जनता के दरबार में मुख्यमंत्री” जैसे कार्यक्रमों से लगातार जनता से सीधा संवाद करने की कोशिश करते थे. जन-संवाद का उनका यह कार्यक्रम अंतर्राष्टीय स्तर तक लोकप्रिय हुआ था. धीरे धीरे यह सब बंद होने लगा, नितीश अपनी ही छवि में आत्ममुग्ध, अकेले निर्णय लेने वाले या मुठी भर लोगो के सलाह से चलने वाले आत्मकेंद्रित राजनीतिज्ञ बनकर रह गए, ऐसा लोगों का मानना है. हलांकि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने राज्य के विकाश के लिए जो कुछ भी किया, वह बिहार के इतिहास में अबतक अतुलनीय है. नितीश कुमार के कई निर्णय ऐसे रहे जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार के विकाश के लिए उन्होंने व्यक्तिगत सिधांतों से कई बार समझौते भी करने पड़े, कई कसमें तोडनी पड़ी- जिसमे मोदी के साथ मंच साझा न करने की कसम भी शामिल थी. सत्य यह है कि यह सब उन्हें बिहार की विकाश की खातिर किया, पर आम जनता के बीच भ्रम फैला कि नितीश सत्ता लोलुप व्यक्ति हैं और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इन सभी बातों ने नितीश की झुझारू और आम जनता से जुड़े नेता की छवि को ध्वस्त किया है.

अफवाह-

बिहार चुनाव 2020 के दुसरे चरण की वोटिंग के बाद मोदी का चुनाव प्रचार में पूरी ताकत के साथ उतरना और नितीश का यह ऐलान कि यह मेरा अंतिम चुनाव है, अब तो मुझे वोट दे दो, मेरा अंत भला तो सब भला. अफवाह फैली कि मुख्यमंत्री पद के एक दावेदार ने रेस के आधे रास्ते में हार मान ली.

तेजश्वी का तेज जन संवाद –

ऐसे लग रहा था कि तेजश्वी पहले से ही अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे. एक दिन में 19 रैलियां कर उन्होंने अपनी जीवटता भी दिखाई. नितीश के विपरीत, महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजश्वी यादव विगत 10 वर्षों से जनता से लगातार जुड़ने की कोशिशें करते दीखते हैं. विपक्ष के नेता रूप में आम जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सत्ता पर हमलावर रहे हैं. यही तो जनता पसंद करती है. जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं, उसके दर्द की बात को लेकर लड़ने वाला फिल्मों का हीरो, जनता का हीरो बन जाता है.

जंगल राज वनाम महंगाई और पलायन का दर्द

जंगल राज NDA का सबसे बड़ा मुद्दा रहा, वहीँ तेजश्वी ने अपने दम पर महंगाई और रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया. पलायन बिहार का सबसे बड़ा सबसे पुराना घाव है. सदियों से बिहारी देश और विदेश (मारीशस से लेकर सूरीनाम और आज़ादी पूर्व से लेकर अबतक) को अपनी मिहनत से समृद्ध करते रहे हैं. COVID-19 के दौरान दुनिया ने बिहारी पलायनकर्ताओं की व्यापक घर वापसी को देखा. इनके पैरों के छालों के घाव तो शायद भर जायेंगे, पर दिल में जो जख्म हैं बेरोजगार होने, दर-ब-दर भटकने का, इस ओर किसी भी ने काम नहीं किया. गरीबों के इस दर्द ने आग में घी का कम किया. तेजश्वी यह उम्मीद जगाने में कामयाब रहे कि शायद अब रोजगार बिहार में ही मिल जायेगा.

बिखरा हुआ प्रतिपक्ष

  • NDA के सभी भागीदार – इस एपिसोड में – अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापते नजर आये. BJP कभी स्वयं, तो कभी नितीश के साथ नजर आती दिखी. बिहार में अपने महत्वपूर्ण दो भागीदरों में से एक को दुसरे के पीछे लठ्ठ लेकर लगा दिया गया. लोगों ने तो यह भी कहा कि चिराग को BJP ने नितीश को हराने की सुपारी दी थी.

परस्पर विरोधी बयानों से भ्रम

  • पहले तेजश्वी ने कहा- हमारी सरकार बनी तो 10 लाख को सरकारी नौकरी देंगे.
    अब NDA के दो सहयोगी परस्पर विरोधाभाषी बयान-
    जवाब में नितीश ने कहा- ये नौकरी तो देंगे, इनको पेमेंट करने के लिए पैसे कहाँ से लायेंगे.
    दूसरी ओर BJP ने अपने घोषणा पत्र में लिखा- सरकार बनी तो 19 लाख को नौकरी देंगे.
    नितीश के इस वक्तव्य से आम जनता में यह सन्देश गया कि जब CM खुद ही ऐसा कह रहे हैं तो इनकी सरकार बनने पर भी नौकरी नहीं मिलने वाली. इससे उन लोगों को बड़ा धक्का लगा जो नितीश के शासन कल में ही BA, MA, B.Ed. आदि की है, और इस उम्मीद में है कि अबकी बार, उनकी गाड़ी पार. साथ ही बिहार में दशकों से कार्यरत लाखों संविदाकर्मियों की उम्मीदें भी एकसाथ टूट गई. ऐसे में तेजश्वी ही उनके टूटते सपनो के खेवनहार दिखे जो 10 लाख सरकारी नौकरियों का दावा कर रहे थे.

लालू पर जनता का भरोसा

दो टूक कहें तो- अब भी है. नव निर्माण और ढांचागत विकास के मामले में लालू राज में चाहे जो हुआ हो. जनता का जो भरोसा, दिल से आदर और सम्मान लालू जी पर था वैसा दूसरा उदाहरण दक्षिण भारत के एक दो नाम छोड़ दे तो सम्पूर्ण भारत में किसी और नहीं मिला है. उनकी संवाद शैली, में आम जनता को जोड़ लेने वाली अनूठी बात थी, वह लाजवाब थी. शासन-सत्ता और भारत की जनता के बीच जो दुरी है उसमे अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजियत से सराबोर भारत नौकरशाही की बड़ी भूमिका रही है. खिलाफ़ में भले कर चाहे कुछ भी नहीं पाए, आम जन इससे बड़ी घृणा करती है. तो अपने बीच अपनी भाषा बोलने-समझने वाले से तो लगाव होगा ही. लालूजी उन्हें अपने गाँव घर के इन्सान लगते है. उनपर भरोसा अधिक है. ऐसा तर्क देने वाले से मैंने पूछा- पर उन्होंने घोटाला किया, जिसकी वजह से जेल में भी हैं.
मिला लाजवाब जवाब- उ किये हैं? और लोग न किये हैं का? ख़ाली उन्ही को जेल और चुनाव लड़ने पर रोक काहे?

और सहानुभूति

घोटाले के अपराध में लालू प्रसाद यादव सजायाफ्ता हैं. पर गाँव में अनेक लोग मिलेंगे जो स्पष्ट कहेंगे की लालू को फसाया गया है. अब जंगल-राज का भय दिखाकर उनके बेटे तेजश्वी को रोकने की कोशिश उन्हें नागवारा है. उन्हें लगता है कि लालू के बाद लालू के बेटे को भी ये लोग बदनाम करने और फ़साने की कोशिस कर रहे हैं. इस थॉट की वजह से तेजश्वी के प्रति सहानुभूति की एक लहर थी, जिसका फायदा उन्हें मिला.

*यह आलेख एग्जिट पोल पर आधारित है

7 COMMENTS

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