Home जीवन की राह प्रहसन- जहाँ से चले थे, वहीं पर खड़े हैं

प्रहसन- जहाँ से चले थे, वहीं पर खड़े हैं

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ट्रेन लखनऊ से दिल्ली की तरफ रवाना होनी थी.

रात दस बजे सभी डिब्बे खचाखच भर गए.

हमारे मित्र भगत जी भी चढ़ गए.

पर जब उन्हें बैठने तक की जगह नहीं मिली …..

तो उन्हें एक उपाय सूझा..

उन्होंने “साँप, साँप, साँप,” चिल्लाना शुरू कर दिया.

यात्री लोग डर के मारे सामान सहित उतर कर दूसरे डिब्बों में चले गए.

अब वे ठाठ से ऊपर वाली सीट पर बिस्तर लगा कर लेट गए।

दिन भर के थके थे सो जल्दी ही नींद भी आ गई.

सवेरा हुआ,

“चाय-चाय” की आवाज पर वे उठे… चाय ली

और चाय वाले से पूछा कि कौन सा स्टेशन आया है?

चाय वाले ने बताया, “लखनऊ” है.

भगत जी ने डांट कर कहा…

अबे, “लखनऊ” से तो रात को चले थे?”

चाय वाला बोला.

“इस डिब्बे में साँप निकल आया था.

इसलिए इस डिब्बे को यहीं काट दिया गया था.

इसी प्रकार अन्धविश्वास रूपी सांप से डरा कर हमारे देश को विकाश से काट दिया गया है. जब दुनियां चाँद तारों की सैर कर रही है हमरे देश में अन्धविश्वास और पाखंड की गोटियाँ खेली जा रही है. एक पल रुक कर जरा सोचिये- हम कैसा भारत बना रहे और देश को कहाँ ले जा रहे.

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