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नक्सलवाद, भारत और मीडिया

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न्यायोचित सुख सुलभ नहीं, जब तक मानव-मानव को,

चैन कहां धरती पर तब तक, शांति कहां इस भव को?

– दिनकर

   नक्सलवाद आज भी भारत की बड़ी आंतरिक समस्या है। इसकी जड़ में आर्थिक विषमता में है। मजदूर वर्ग सदियों से आजतक ठेकेदारों, बड़े भूस्वामियों और पुंजिपतियों के शोषण का शिकार होता रहा है। जंगल, जमीन व जल जैसे परंपरागत आजीवीका के साधनों पर गरीबों की आदिम ज़माने से निर्भरता रही है, इस दौर में से भी उन्हें इन सब से  वंचित किया जाता रहा है। जिस प्रशासन पर मजदूरों को शोषण से बचाने की जिम्मेदारी है, प्रायः कई स्थानों पर उनका सांठ-गांठ भी शोषकों के साथ ही रहता है। आलम ये है कि सरकार मजदूरों एवं वंचितों के लिए कोई कार्यक्रम भी चलाती है तो वह भी ठेकेदारों, बिचैलियों और प्रशासनिक अधिकारियों के धनोपार्जन का जरिया बनकर रह जाती है। एक साधारण सा उदाहरण नक्सल प्रभावित राज्य  छत्तीसगढ़ या झारखंड का लिया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों से ये राज्य इतने भरपूर है कि अपने अलावे कई राज्यों को बेहतर तरीके से पाल सकते हैं। परन्तु, आज भी यहाँ की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा भूखी-नंगी है। अपने प्राणों की रक्षा के लिए पशु भी संघर्ष करता है। ऐसे में अगर इंसानों ने अगर हथियार उठा लिये तो क्या आश्चर्य?

इस हिंसक आंदोलन के कारण प्रतिवर्ष हजारों जानें जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि  इसकी शुरुआत प. बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी नामक स्थान से होती है, जहां से यह आसपास के क्षेत्र में फैल गया। यह आजादी के बाद के जमींदारों व साहुकारों का दौर था। आम जनता इन सबके बीच पीस रही थी। हर तरफ से लूट-खसोट, जुल्म और ज्यादतियों से त्रस्त जनता ने तब अपने हक की लड़ाई के लिए पहली बार हथियार उठाये थे। इसका नेतृत्व शुरुआती में चारू मजूमदार व कानू सान्याल ने किया। कालांतर में यह हिंसक आंदोलन जुल्म और शोषण के विरोध का प्रतीक बन गया और देश के कई हिस्सों में फैल गया। उनकी पहचान नक्सलाईट के रुप में की जाने लगी। बाद में उनके हथियारबंद लड़ाई को नक्सलबाड़ी नामक स्थान से जुड़े होने के कारण, नक्सलवाद का नाम दे दिया गया।

नक्सलियों द्वारा की गयी वारदात के बाद सरकार, पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों को भेजकर विद्रोह को दबाने का प्रयास करती है। सवाल यह है कि अपने ही खराब अंग को काट देना कोई हल निकलेगा क्या? और पुनर्विचार्निय है कि उस तरह के इलाज का क्या फायदा, कि ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता गया?

भारत का 40 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका नक्सलियों के कब्जे में हैं

आंकड़ों के मुताबिक आज भारत का 40 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका नक्सलियों के कब्जे में हैं। मई 2005 से 2010 के बीच नक्सल हमले मे 10268 लोग मारे गये। इसमे 2009 मे 2372, 2008 में 1769 और 2007 में 1737 लोग नक्सली वारदातों के शिकार हुए। कई इलाकों में नक्सलियों की समानान्तर सरकार चलती है। उनका अपना न्याय तंत्र और संविधान हैं। ऐसे मे विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया यानि लोकतंत्र के चारों स्तम्भों की यह सहज और स्वभाविक जिम्मेदारी बनती है कि कैसे इस विकराल होती समस्या के समाधान के प्रति गहराई से सोचें।

विकास के साथ, भय और भ्रष्टाचार से मुक्त समाज की बात की जाती है। मगर भ्रष्ट्राचार इतना कि राजीव गांधी के समय में 1 रुपये का 20 पैसा जनता तक पहुंचता था, आज सरकार स्वीकार करती है कि वह 20 पैसा 15 पैसा या उससे भी कम हो गया है। भ्रष्टाचार और जमाखोरी को अमीर बनने को मन्त्र मान चूके इस देश में पैसे वालों का काम भले ले देकर चल जाता हो, आम आदमी के विकास, न्याय और  उत्थान के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं। ऐसे में आजाद भारत में दो वतन पलता है- एक उनका जो बड़े होटलों के लक्जरी कमरों में बैठकर गांव के गरीबों के लिए नीतियां बनाते हैं, (भले ही उसने गांव और गरीबी को कभी भी न देखा, जाना और समझा हो।) और दूसरा उनका जो वर्षों से जानवरों के समान निरीह जीवन जीने को विवश हैं।

आर्थिक विषमता की स्थिति कितनी भयानक है, जरा देखिये- पिछले कुछेक दशकों में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चैड़ी होती गयी। इसका अंदाजा संयुक्त राष्ट्र संघ और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के हाल मे आये रिपोर्ट से लग जायेगा। आंकड़ों के अनुसार भारत के आठ राज्यों में अफ्रीका के 26 मुल्कों से अघिक गरीब रहते हैं। इन राज्यों में 42 करोड़ लोग गरीब हैं जबकि अफ्रीका के निर्धनतम देशों में भी गरीबों की संख्या मात्र 26 करोड़ है। भारत सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 10 करोड़ से अधिक हैं, अर्थात आज भी भारत में विश्व के एक तिहाई गरीब रहते है, यह संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।

यह कैसी विडंबना है कि जिस भारत में अरबपतियों संख्या लगातार बढ़ रही है, उसी भारत देश में 83 करोड़ 70 लाख लोगों की प्रतिदिन की आय 20 रुपये से भी कम है, प्रतिदिन  5लाख से ज्यादा लोग भोजन के अभाव में खाली पेट सोते हैं, और कड़ी धुप में जीतोड़ मिहनत कर संसार का पेट भरने वाला किसान, आत्महत्या को विवश।

भारत को 1947 में राजनैतिक आजादी प्राप्त हुई। 1950 में हम गणतंत्र के नागरिक भी हो गए। पर इसी भारत का एक बड़ा तबका आजादी के पहले, बाद में और अब तक वहीं का वहीं पड़ा रहा है। आजादी के बाद आम जनता को शासन से काफी आशाएं थीं, जो कभी पूरी नहीं हुई्र।

महात्मा गांधी तब कहा था- “हमारे देश का आखिरी व्यक्ति जो की सुदूर गांव में रहता है, जीतोड़ मेहनत करता है पर अपना और अपने परिवार  का पेट नही भर पाता, उसके कपड़े मैले और फटे है, उसकी आखों ने आशा की चमक खो दी है, जब तक उस तक विकास की रोशनी नहीं पहुंचती, यह आजादी अधूरी है।”

लोकतान्त्रिक शासन तंत्र की अपनी बाधाएं हैं और पर कुछ राजनेताओं की लोलुप प्रवृतियों ने तब से अब तक आम आदमी की आजादी को उससे ज्यादा दूर ही किया है। सोचो, यह कैसी बिडंबना है कि जो श्रमिक ईंट और इमारतें बनाता है उसे झोपड़ी भी मयस्सर नहीं, जो कपड़े बुनता है वह अधनंगा है और जो किसान मजदूर दिन रात पसीना बहाकर अनाज उपजाता है उसके बच्चे भूखे सोते हैं। यह हाल और इससे उपजी आग किसी एक स्थान पर नहीं बल्कि कमोबेश पूरे भारत में है। हमारी सरकारें विकास का डंका चाहे जितना पीट लें, पर गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा से त्रस्त जनता जब हथियार उठाने पर विवश है तो इस विकास क्या मायने हैं? किसकी? और कैसी आज़ादी? जैसे सवाल पैदा होते रहेंगे।

नक्सलवाद भारत के लिए नई समस्या नहीं हैं पर इसके निवारण के प्रयास या तो नगण्य हुए या कुछ किया गया तो ऐसा कि पासा हमेशा उल्टा पडा़। सलवा जुडूम से लेकर आपरेशन ग्रीन हंट तक कोई भी नक्सल विरोधी सरकारी अभियान प्रभावशाली साबित नहीं हो सका। यही नहीं, नक्सलवाद से निपटने के बारे में विभिन्न राज्य सरकारों एवं केंद्र के बीच मतभेद है। केंद्र सरकार जहां शक्ति और सख्ती से इसे कुचलना चाहती है, वहीं अधिकांश राज्य सरकारों का मानना है कि समुचित विकास के द्वारा ही इस पर काबू पाया जा सकता है।

देश अनेक बुद्धिजीवी, यहां तक कि महाश्वेता देवी जैसी ख्यातिलब्ध लेखिका व विचारक ने हमेशा ही नक्साली विचारधारा का सैद्धांतिक समर्थन किया था। आज देश की एक बड़ी आबादी उनसे हमदर्दी रखती है जो यह मानती है कि नक्सलवाद गरीबों की प्रकृति प्रदत आजीविका के साधन के लिए की जा रही लड़ाई है जिसे लगातार देशी-विदशी पूंजिपतियों द्वारा हड़पने की साजिश की जाती रही है।

आज सरकार, न्यायपालिका, और खासकर मीडिया का यह दायित्व है कि वह अपने माध्यमों से जनता को शिक्षित और जागरूक करे ताकि उग्रवाद के रास्ते पर चल पड़े कदम रूकें और वे विकास के कार्यक्रमों से जुड सकें। वंचितों के बच्चे स्कूलों में जायें। नौजवानों को हथियार थामने से पहले कैसे रोजगार के प्रति उन्मुख करें। सब मिलकर लोकतंत्र को सुदृढ करने का प्रयास करें ताकि वंचित तबका मुख्यधारा में शामिल हो सके। हालांकि समय-समय पर मीडिया ने सरकार और समाज को नक्सवाद के खतरों से सावधान किया है। पर, आज के हालात में उसकी जिमेदारी कई गुना बढ़ जाती है क्योकि वही लोकतंत्र का अंतिम रक्षक है।

ऐसे मे मीडिया पर आम आदमी के लोकतंत्र से उठते विश्वास को पुनस्र्थापित करने का बड़ा दायित्व है। आज़ादी के बाद से ही सरकारें इसे हल्के में लेती रही। परन्तु, मीडिया ने हमेशा ही सरकार को सच दिखाने का प्रयास किया। उग्रवादियों का विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका पर विश्वास भले न हो लोकतंत्र के चैथे स्तंभ पर कहीं न कहीं उसे आज भी भरोसा है। मीडिया ने बिना किसी पक्षपात के दोनों की ही बातें जनता के सामने रखी है। साथ ही, उसने एक ओर सरकार को जहां यह आईना दिखाया कि नक्सलवाद उन इलाकों में पनपा जहां विकास की किरणें नहीं पहुंची, जहाँ लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित थे। नक्सलवाद गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी के मूल में पनपता और बढ़ता है। इन्हें दूर कर हम नक्सलवाद को खत्म कर सकते हैं। समाज के आखिरी व्यक्ति तक शिक्षा की राशनी पहुंचे, उसे उचित रोजगार मिले, उसकी गरीबी दूर हो तो भला कौन परिवार और बीबी-बच्चों को छोड़कर हथियार लिए वह जंगलों में क्यों भटकना चाहेगा?

दूसरी ओर मीडिया ने नक्सलवाद पर भी कड़े सवाल खड़े किये और साबित किया कि हजारों लोगों का खून बहाने के बावजूद भी उन्हें कोई उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी। वक्त है आज़ादी के मायनों समझने, उससे उपजी जिम्मेदारियों निभाने, लोकतांत्रिक मूल्यों की सर्वोच्चता को स्थापित करने, और सबसे बड़ी अंतिम जन तक उसकी आज़ादी, उसके लोकतंत्र और उसके बराबरी के हक़ को पहुचाने का।

और अंत में

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर रचित “कुरुक्षेत्र” की कुछ पंक्तियाँ –


युुद्ध को बुलाता है अनीती- ध्वजधारी या कि
वह जो अनीति – भाल पैर दे पांव चलता?
वह जो बना के शांति -व्यूह सुख लूटता या
वह जो अशांत हो क्षुधानल से जलता?
कौन बुलाता युद्ध? जाल जो बनाता?
या जो जाल तोड़ने को क्रुद्र काल-सा निकलता?

पापी कौन? मनुज से उसका न्याय चुराने वाला?  

याकि न्याय खोजते विध्न का सीस उड़ाने वाला?

स्वत्व मांगने से न मिले, स्ंघात पाप हो जाये,

कहो युधिष्ठिर, ऐसे नर , जियें या कि मिंट जायें।

शान्ति नहीं तब तक जग में, सुख भाग न नर का सम हो,

नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।


यह आलेख श्री रणवीर कुमार रवि द्वारा मास कम्युनिकेशन की पढाई में इंदिरा गाँधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी से प्राप्त असायान्मेंट के लिए लिखा गया था.

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