कोरोना महामारी: A Alarm of God !!!

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महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के जीवन की एक घटना है- दूसरा विश्वयुद्ध हो चुका था और परमाणु हथियारों का औचित्य सिद्ध हो चूका था क्योंकि उसके संधान से होरोशिमा और नागासाकी नाम के दो बड़े शहर के लाखों नागरिक कुछ सेकंड में  मटियामेट हो चुके थे. उस वक्त अमेरिका में रह रहे आइंस्टीन से किसी पत्रकार ने पूछा कि दो विश्वयुद्ध हमने देखे लिए, तीसरा कैसा होगा?

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महान वैज्ञानिक के द्वारा दिया गया जवाब यहाँ काबिलेगौर है जिसे सुनकर आप भी चौकेंगे- “तीसरे विश्वयुद्ध का तो मैं नहीं बता सकता मगर उसके बाद भी धरती पर इन्सान रहा तो चौथा विश्वयुद्ध निश्चय ही सिर्फ पत्थर के हथियारों से होगा .”

आइंस्टीन का यह जवाब हमारे लिए एक बड़ी चेतावनी की तरह है. महत्त्व इस बात का है कि अब जबकि हम तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़े हैं, हमने अपने अबतक के इतिहास से क्या सिख ली? विज्ञान ने जो संसाधन हमें दिए उसका इस्तेमाल हमने कैसे किया? प्रकृति से प्रदात अनुदानों का प्रयोग अपने भाइयों के हक़ में किया या उनकी हत्या में?

कोरोना महामारी से सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार है और इस मामले में चीन की जो भूमिका रही है, उसकी जितनी निंदा की जाये कम होगी. और जैसे आरोप लग रहे हैं कि इस बीमारी के वायरस को प्रयोगशाला में तैयार किया गया और फिर विश्व भर में फैलाया या फैलने दिया गया, मानवता के प्रति किया गया यह अपराध महापाप से कम नहीं है. और अगर यह मानव प्रायोजित नहीं भी है जैसा कि चीन का दावा है तो भी महामारी को रोकने के लिए समय रहते प्रयाप्त क़दमों का नहीं उठाया जाना, विश्वभर के देशों को ससमय सूचित नहीं किया जाना, चीन और WHO जैसी बड़ी संस्थओं की भूमिका और औचित्य पर कड़े सवाल खड़े करता है. आप देख रहे हैं कि आज किस तरह से शक्तिशाली देशों को इस एक वायरस covid19 ने घुटनों पे ला खड़ा किया है. विश्व भर की बड़ी आबादी या कहें कि पूरी मानवता अबतक के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है.

आधुनिक युग जिसे विज्ञान का युग भी कहा जाता है इसमें साइंस और टेक्नोलॉजी ने अद्भुत और सराहनीय तरक्की की है. मनुष्य सुक्ष्मतिशुक्ष्म से लेकर आनंत ब्रम्हांड के द्वार तक जा पहुंचा है. इसी 20वीं सदी में इसी विज्ञानं के सहारे मनुष्य ने दो दो विश्व युद्ध लड़े हैं. विज्ञानं की प्रगति के अहंकार से अँधा हुआ मानव विनाश के नित नए शस्त्र का संधान कर खुश होता रहा है. आत्म रक्षा के नाम पर शुरू हुआ यह शस्त्रों के निर्माण की प्रतियोगिता तलवार, मशीनगन के रस्ते से होता हुआ, अणु और परमाणु की सीमाएं लांघता हुआ, जीवाणु और  विषाणु तक का उपयोग विनाशक शस्त्रों के रूप में किया जाने तक आ पहुंचा है. आज देशों की शक्ति का आकलन इस आधार पर किया जाता है कि जिसके पास जितने जानलेवा विनाशक हथियार हैं वह उतना शक्तिशाली देश है. पूरी मानवता विकाश के नाम खाड़ी की गई पर विनाश के ढेर पर पड़ी है. परिस्थितियां कुछ ऐसे समझ सकते हैं कि बिच समुद्र में चलते जहाज (पृथ्वी) पर बारूद का ढेर लगा दिया गया है और सभी यात्री माचिस की तीली जलाये खड़े एक दुसरे को ललकार रहे हैं.

एक कहानी याद आती है जिसमें ऐसे हीं प्रसंग को बड़े ही मजेदार ढंग से समझाया गया है –

किसी नगर में दो पडोसी रहा करते थे, उनके घर एक दुसरे के आमने सामने थे.

दोनों प्रातःकाल की पूजा में अपनी तरक्की की दुआ नहीं करते बल्कि दुसरे से अधिक तरक्की की दुआ करते.

दोनों ओर लगातार मिल रही पूजा अर्चना से प्रसन इश्वर प्रकट हुए और वरदान दिया

कि वे जो इच्छा करेंगे तत्काल मिलेगा. परन्तु एक छोटी सी शर्त लगा दी कि तुम जो मांगोगे तुम्हारे पड़ोसी को उसका दुगना मिलेगा.

जिस पडोसी से व्यक्ति दिन रात जलता रहता है. उसकी दुगनी तरक्की होना किसी भी पारकर सहन नहीं कर सकता था. आधुनिक इंसान की मनःस्थिति तो आप सब जानते ही हैं. उसकी ख़ुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी तरक्की भले ही नहीं हो, पर पडोसी की बिलकुल नहीं होनी चाहिए. वह सामने वाले के पतन में ही अपना उत्थान देखता है.

अब हुआ यह कि जब भी कोई स्वयं के लिए एक वास्तु मांगे, तो उसके पडोसी को तत्काल दो मिल जाये. इस प्रकार उनकी परस्पर जलन और द्वेष भावना दिन प्रतिदिन और भी बढ़ने लगी. और वे एक दुसरे से बदला लेने के लिए मौके की तलाश में रहने लगे. एक दिन हुआ यह कि किसी छोटी मोटी बात पर दोनों की आपस में कहासुनी हो गई. गुस्से में आकर एक ने वरदान माँगा- हे प्रभु मेरी एक आँख फुट जाये.

फलतः हुआ आय कि उसकी एक आँख फूटी तो पडोसी की दोनों आँख फुट गई.

यह होता देखकर उसकी और हिम्मत बढ़ी और

फिर

एक कान

एक हाथ

एक टांग

और अंत में जो नहीं होना चाहिए था वही हुआ.

पर वह नादान मरते मरते अंत तक यह सोचकर खुश होता रहा कि मेरी एक गई सो गई  पर उसकी तो दोनों ही गई.

मित्रों यही आज इन्सानों की मति-गति हों गई है.

विश्व भर में- देशों और महादेशो के बिच, जातियों और सम्प्रदायों के बिच, पड़ोसियों के बिच, भाई भाई के बिच, चाचा भतीजे के बिच, सभी संबंधों में द्वेष और दुर्भावना, अहंकार और अविश्वास गहरी खाई है.

अधिक से अधिक इकठा कर लेने की हवस, दूसरों को जलाने की धधक, दिखा देने की आग इतनी बढ़ रही है कि दुसरे का घर फूंकने के लिए लोग पहले अपने घरों में आग लगाने को तैयार बैठे हैं. मानव द्वारा किया गया सारा ज्ञान विज्ञानं का अनुसन्धान मानवता के संहार का संधान न साबित हो.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ पंक्तियां याद आती है-

सावधान , मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार ,

तो इसे दे फेंक , तज कर मोह , स्मृति के पार ।

हो चुका है सिद्ध , है तू शिशु अभी नादान ;

फूल – काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान ।

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार ;

काट लेगा अंग , तीखी है बड़ी यह धार ।

विज्ञान की ही बात मानें तो विश्व ब्रम्हाड की विशालता के मुकाबले इन्सान की तो बात जी जाने दो हमारी धरती और सौरमंडल का अस्तित्व धुल के एक छोटे से छोटे कण से अधिक नहीं है. फिर इस पर कुछ लाख वर्ष से रह रहे मानवों की औकात ही क्या है. जी हाँ, चौंकिए नहीं.

तर्कशास्त्रियों ने इसे इस प्रकार से समझाया है कि पृथ्वी की उत्पत्ति से अभी तक के समय को अगर एक दिन अर्थात 24 घंटों का मान लो तो इसपर मानव जन्म 23बजकर 55मिनट पर हुआ है. इस हिसाब से देखें तो मानवता अभी शैशवावस्था में है. किशोर, युवा और वयस्क होने में अभी काफी समय बाकि है. अपने क़दमों पे खड़ा होकर सही और सीधा सीधा चलना भी नहीं सिखा है इसने. बाल्यावस्था की ओर जाते हुए विनाश के संधान में जा जुटा है. दुसरे के हाथ में अच्छा खिलौना देखकर ललचाता है, नहीं मिले तो झुंझलाता है, कमजोर को सामने पा गुरराता और चिलाता है. ऐसे नादान के हाथों विज्ञान की तलवार लग गई है तो निश्चय ही वह अपने और दूसरों के नाक, कान कटेगा.

कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो नित नए अनुसंधानों में रत वैज्ञानिक समुदाय अपना जीवन होम इसलिए तो नहीं करता कि उसके खोज से इस धरती से मानव को मिटा दिया जाये, मानवता को शर्मशार किया जाये. सम्पूर्ण विश्व का मानव समुदाय अत्यंत श्रधा और विश्वास से विज्ञानवेताओं की ओर देखती है. प्राकृतिक तथा मानव जनित आपदाओं और अपनी किस्मत से हरे हुए अनंत आमजन समुदाय आपमें ही  अपना रक्षक और उद्धारकर्ता मानती है. और उनका यह विश्वास कायम रह् पायेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.

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